श्री कल्लूमल संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना सन 1878 सतत् 1938 में स्वनाम धन्य महाराज श्री कल्लूमल गौड़ जी के द्वारा दी गयी थी। जिसका उद्देश्य संस्कृत भाषा का संवर्धन, संस्कार युक्त शिक्षा तथा छात्रों को स्वालंबन की भावना का विकास करना है। इस महाविद्यालय की गौरवमयी गुरु शिष्य परम्परा रही है यहां के आचार्यो एवं छात्रों ने समाज में "भारतस्य प्रतिष्ठा दे, सस्कृतं सस्कृतिस्तथा" की सूक्ति को सिद्ध किया है। यहाँ के संस्कृतोपाशको ने समाज में सर्वत्र अलख जगायी है। इस विद्यालय में प्रथमा से लेकर आचार्य पर्यन्त कक्षाओं की शिक्षा, व्याकरण, साहित्य पुराण दर्शन न्याय तथा वेदांत आदि प्राचीन विषयो की प्रदान की जाती है। प्रथमा से उत्तर मध्यमा तक की परीक्षाएं वर्ष 2000 के बाद से उत्तर प्रदेश माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद, लखनऊ, द्वारा संचालित होती है जबकि उससे पूर्व समस्त परीक्षायें सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्व विद्यालय वाराणसी द्वारा सम्पन्न होती थी। विद्यालय में दोनों विभाग संचालित हो रहे है। प्रायः परीक्षाफल शत प्रतिशत रहता है।
शहर के ह्रदय में स्थित विद्यालय में शुद्ध शांत वातावरण है। विद्यालय परिसर में माँ शारदा, भगवती दुर्गा, श्री गणेश जी का सुन्दर मंदिर स्थित है। विद्यालय के निकट अन्य प्राचीन मंदिर तथा अन्य धर्मो के देवालय भी स्थित है। विद्यालय के पास बाजार, यातायात के अच्छे साधन, मुख्य डाकघर, थाना, कचहरी, रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन, बैंक , गंगा नदी एवं चिकित्सालय सब कुछ सन्निकट है।
संस्कृत भाषा के स्वर्ण युग का प्रतीक यह विद्यालय सदा ही नये-नये कीर्तिमान स्थापित करता रहता है। यहाँ से पढ़कर निकलने वाले छात्र समाज के विभिन्न संस्थानों में जैसे सेना, शिक्षा, न्याय इत्यादि में अपनी सेवा प्रदान कर रहे है।
सबसे प्राचीन यह संस्था संस्कृत विद्या को अनंत काल तक अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए अपने उद्देश्य के लिए सदा प्रगतिशील है।